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Tuesday, November 4, 2008

ये आजादी नही

आजादी के पहले हम अग्रेजों के गुलाम थे और आजादी के लिए लड़ने और मरने वालों ने सोचा था कि आजाद होने के बाद सब ठीक हो जाएगा परन्तु बिहार और इसके आसपास के लोगों की नियति गुलामी ही है। बिहार मे बाढ़ के अलावा क्या है। बिहारियों या यूपी वालों के पास कमाने के लिए नौकरी या मजदूरी ही एकमात्र विकल्प है आप भारत के किसी भी विकसित राज्यों में जाएंगे वहां ये लोग मजदूरी करते हुए ठेले पर कुछ बेचते हुए या रेलवे स्टेशन पर कुली के रूप में। इधर कुछ सालों से पढ़ाई में इन लोगों का रुझान बढ़ा है तो अच्छी नौकरियों में इन लोगों का अनुपात बढ़ा है अब बहुत लोगों को यह चीज खलने लगी है। ये कुलीगिरी और मजदूरी करने वाले सर्विस करेंगे तो फिर इन नीच समझे वाले कामों को कौन करेगा। इसलिए अब जब ये नौकरी के लिए परीक्षा देने जाते हैं तो कुछ सालों से इन्हें मारा या प्रताड़ित किया जा रहा है। महाराष्ट्र हो या आसाम हर जगह यह देखने को मिल रहा है और भारतवर्ष के शासक इसकी भर्त्सना कर चुप हो जाते हैं। यदि ऐसा ही हो्ता रहा तो भारतवर्ष के संघीय ढांचे पर प्रश्न उठने शुरू हो जाएंगे।क्या ये लोगॉं की किस्मत में गुलामी ही करना लिखा है? यहां के कितने लोग बड़े उद्योगपति या व्यवसायी बन पाए हैं। और छोटी-मोटी नौकरी करने से भी वंचित करने का प्रयास हो रहा है, वो कोइ उपकार नही कर रहा है। ये सभी प्रतियोगिता पास करके नौकरी करना चाह्ते हैं जहां सभी राज्यों के लोगों को बराबर का मौका मिलता है तो फिर इस संघीय ढांचे में रहने का क्या मतलब है

1 comment:

संदीप said...

बहुत दिनों के बाद किसी गैर-बिहारी द्वारा बिहारियों के पक्ष में कुछ लिखा हुआ पढ़ने को मिला, सही बात है सुमित यह वह भारत तो कत्‍तई नहीं है जिसके लिए भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू और उनके साथी शहीद हुए थे...

लेकिन मेरा मानना है कि इन समस्‍याओं का समाधान अब उसी रास्‍ते पर चलने से होगा, जिस पर भगतसिंह चले थे, हालांकि अब उसका स्‍वरूप जरूर बदल गया