आज हमारा देश हर क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। बड़े शर्म की बात है कि कई छोटे-छोटे देश जो बाद में अस्तित्व में आए वे कई मामलों में हमें पछाड़ चुके हैं। इस तरह पिछड़ जाने का सबसे बड़ा कारण है कि नई व उन्नति की सोच रखने वाले लोगों का आगे न आना। ऐसा नहीं है कि वो लोग आगे आना नहीं चाहते, उन्हें आगे आने से रोका जाता है। हमारे देश में लोकतंत्र प्रणाली है, जनता द्वारा चुने गए नुमाईंदे या नेता देश की सत्ता संभालते हैं। उन्हीं सत्ताधारियों द्वारा ही देश के भविष्य व विकास की नीतियां बनाई जाती हैं। देश की निर्भरता राजनीति पर है परन्तु अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि लोगों का विश्वास राजनीति से उठता जा रहा है। उठे भी क्यों ना आम आदमी को न तो भर पेट भोजन मिल पा रहा है और न ही सुरक्षा। आखिर आम आदमी करे तो क्या करे। देश में अवसरवादी राजनीति का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। उनका ध्यान बस पैसा कमाकर स्विस बैंक में जमा करवाने पर है। प्रत्येक नेता चाहता है कि नेता बनने के बाद उसके पास उच्च क्वालिटी की सुख सुविधाएं हों। उस बेचारी जनता कि कोई नहीं सुनता जो भूखे पेट आसमान की छत के नीचे सड़क के बीचों बीच सोती है। अधिकतर नेताओं को तो यह भी पता नहीं होगा कि रात में आसमान कैसा दिखता है। राजनीति कि इस दशा को देखकर आपके दिमाग में यही आता होगा कि हमारा भविष्य क्या है ? देश के पास आज बहुत बड़ी ताकत है जिसका इस्तेमाल कर वह अपने आप को संवार सकता है। वह ताकत है युवा शक्ति! जो हमारी कुल जनसंख्या के आधे से भी अधिक है। एक सर्वे के अनुसार 75 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनकी आयु 35 वर्ष या इससे कम है। बस आवश्यकता है इस शक्ति का सही व उचित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना। इस बार के चुनावों में युवाओं को शामिल करना अच्छा संकेत था परन्तु अभी भी बहुत कमियां है। वो ही लोग राजनीति में आगे आ रहे हैं जिनके पास राजनीति की विरासत है या पैसा बहुत अधिक है। देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो देश की सत्ता संभालकर एक नयी दिशा देना चाहते हैं। उनका सपना है देश को खुशहाल व समृद्ध देखना परन्तु ऐसे लोगों को मौका ही नही मिल पा रहा क्योंकि देश के बुजुर्ग नेता रिटायर ही नहीं होना चाहते। बस अधिकतर लोग इसी बात के सहारे देश की सर्वोच्च कुर्सियों पर जमे हुए हैं कि अनुभव के बिना देश चलाया ही नहीं जा सकता। मुक्षे नहीं लगता कि दुनिया के जितने भी देश आज विकसित हैं उनका नेतृत्व किसी युवा के हाथ नहीं। हम अपने देश में ही देख सकते हैं कि अधिकतर कंपनियों के उच्च पदों पर युवा ही हैं जो अच्छी तरह से उन्हें संभाल ही नहीं रहे साथ ही साथ कामयाबियों के नए मुकाम भी बना रहे हैं। अतः उन लोगो को आगे आने देना चाहिए जो लगातार कह रहें है - दो मौका लगाएं चौका......
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Sunday, November 22, 2009
दो मौका लगाएं चौका
आज हमारा देश हर क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। बड़े शर्म की बात है कि कई छोटे-छोटे देश जो बाद में अस्तित्व में आए वे कई मामलों में हमें पछाड़ चुके हैं। इस तरह पिछड़ जाने का सबसे बड़ा कारण है कि नई व उन्नति की सोच रखने वाले लोगों का आगे न आना। ऐसा नहीं है कि वो लोग आगे आना नहीं चाहते, उन्हें आगे आने से रोका जाता है। हमारे देश में लोकतंत्र प्रणाली है, जनता द्वारा चुने गए नुमाईंदे या नेता देश की सत्ता संभालते हैं। उन्हीं सत्ताधारियों द्वारा ही देश के भविष्य व विकास की नीतियां बनाई जाती हैं। देश की निर्भरता राजनीति पर है परन्तु अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि लोगों का विश्वास राजनीति से उठता जा रहा है। उठे भी क्यों ना आम आदमी को न तो भर पेट भोजन मिल पा रहा है और न ही सुरक्षा। आखिर आम आदमी करे तो क्या करे। देश में अवसरवादी राजनीति का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। उनका ध्यान बस पैसा कमाकर स्विस बैंक में जमा करवाने पर है। प्रत्येक नेता चाहता है कि नेता बनने के बाद उसके पास उच्च क्वालिटी की सुख सुविधाएं हों। उस बेचारी जनता कि कोई नहीं सुनता जो भूखे पेट आसमान की छत के नीचे सड़क के बीचों बीच सोती है। अधिकतर नेताओं को तो यह भी पता नहीं होगा कि रात में आसमान कैसा दिखता है। राजनीति कि इस दशा को देखकर आपके दिमाग में यही आता होगा कि हमारा भविष्य क्या है ? देश के पास आज बहुत बड़ी ताकत है जिसका इस्तेमाल कर वह अपने आप को संवार सकता है। वह ताकत है युवा शक्ति! जो हमारी कुल जनसंख्या के आधे से भी अधिक है। एक सर्वे के अनुसार 75 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनकी आयु 35 वर्ष या इससे कम है। बस आवश्यकता है इस शक्ति का सही व उचित उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना। इस बार के चुनावों में युवाओं को शामिल करना अच्छा संकेत था परन्तु अभी भी बहुत कमियां है। वो ही लोग राजनीति में आगे आ रहे हैं जिनके पास राजनीति की विरासत है या पैसा बहुत अधिक है। देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो देश की सत्ता संभालकर एक नयी दिशा देना चाहते हैं। उनका सपना है देश को खुशहाल व समृद्ध देखना परन्तु ऐसे लोगों को मौका ही नही मिल पा रहा क्योंकि देश के बुजुर्ग नेता रिटायर ही नहीं होना चाहते। बस अधिकतर लोग इसी बात के सहारे देश की सर्वोच्च कुर्सियों पर जमे हुए हैं कि अनुभव के बिना देश चलाया ही नहीं जा सकता। मुक्षे नहीं लगता कि दुनिया के जितने भी देश आज विकसित हैं उनका नेतृत्व किसी युवा के हाथ नहीं। हम अपने देश में ही देख सकते हैं कि अधिकतर कंपनियों के उच्च पदों पर युवा ही हैं जो अच्छी तरह से उन्हें संभाल ही नहीं रहे साथ ही साथ कामयाबियों के नए मुकाम भी बना रहे हैं। अतः उन लोगो को आगे आने देना चाहिए जो लगातार कह रहें है - दो मौका लगाएं चौका......
Friday, November 20, 2009
मुसीबत में किसान
देश का विकास मुखयतः जवान और किसान के हाथ में होता है। जवान दिन रात एक करके देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। किसान कड़ी मेहनत से फसल उगाकर देश का पेट तो पालता ही है साथ ही साथ देश के सकल घरेलु उत्पादन में भी महत्वपूण योगदान करता है। हमारे देश में किसानों की संखया पूरी जनसंखया की आधे से ज्यादा है। अर्थात् आंकड़ों के हिसाब से उनका बहुमत है। बडे़ दुःख की बात है कि बहुमत के होते हुए भी अब तक वह कुछ नहीं कर पाए। अभी तक किसी भी सरकार ने किसानों का दर्द समक्षना तो दूर समक्षने की कोशिश ही नहीं की। स्वतं
हिन्दी पर राजनीति क्यों

हिन्दी बोलना हमारा अधिकार है। हिन्दी भाषा में वो शक्ति और मिठास है कि प्रत्येक बोलने वाले में तो उत्साह भरती ही है साथ में सुनने वाला भी मंत्रमुग्ध होए बिना नही रह सकता। इस बात कि पुष्टि समय समय पर हुई है। चाहे वह विवेकानंद का अमेरिकी सम्मेलन में संबोधन हो या अटल बिहारी के भाषन ऐसे अनेकों उदाहरण इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। आज हमें आजाद हुए ६० सालों से भी ज्यादा वक्त हो गया है परन्तु अभी तक हम हिन्दी को अपने मनों में नही बसा पाए हैं । अधिकतर इसका सबसे बडा दोषी अंग्रेजी को ही मानते है। क्या इस तरह किसी दूसरी भाषा को कसूरवार बनाकर हमारा लाभ हो सकता है। बिल्कुल नही अगर ऐसा होना होता तो आज हिन्दी की स्थिती अंग्रेजी से बेहतर होती। हमें कब समक्ष में आएगा कि अनेक भाषाओं का ज्ञाता होना हमारी कमजोरी नही ताकत है। भिन्न भाषायों का ज्ञान ही विभिन्न देशों के रिश्तों में मधुरता ला सकता है। क्योंकि दूसरो से मधुर व गहरे सबंध बनाने में संचार यानि आमने सामने की बातचीत का होना बहुत आवश्यक होता है। एक दूसरे के साथ दुःख सुख बांटना दिलों को जोड़ता है। लेकिन दूसरी भाषाएं सीखने की तत्परता में अपनी भाषा को भूल जाना भी ठीक नही। भारतीय होने के नाते हिन्दी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए,ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां हिन्दी बोलने में अपनी बेइज्जती नहीं गर्व महसूस करें। इसके लिए हम हिन्दी से जुडे़ कई कार्यकम जैसे हिन्दी दिवस व हिन्दी पखवाड़ा मनाते है। राष्टी्रय भाषा हिन्दी होने के नाते हमारा अधिकार है कि हम इस भाषा का प्रयोग आजादी से कभी भी कहीं भी कर सकते है। ऐसे में अगर किसी नेता को हिन्दी में शपथ लेने से रोका जाता है तो हम समक्ष सकते है कि देश के भीतर भी हिन्दी के कई दुश्मन है। यह दुश्मन कोई ओर नही ब्लकि वह नेता हैं जिनका चुनाव हम देश व समाज की बेहतरी के लिए करते हैं। मैं यह लेख लिख रहा हूं क्योंकि महाराष्ट्र्र विधानसभा में मनसे के विधायकों ने जो करतूत की वह बहुत निंदनीय थी। मैं समक्षता हूं कि उस दृश्य को देखकर या पढ़कर केवल में ही नही बल्कि पूरा देश दर्द में था। राज ठाकरे कि पार्टी ने ऐसा पहली बार नहीं किया । इससे पहले भी वह हिन्दी बोलने वालों तथा उत्तर भारतियों की खिलाफत कर चुके हैं। कब तक ये नेता अपने फायदे के लिए जनता व देश की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहेंगे। वे तो बस इसी तरह सुर्खियां बटोरना चाहते हैं। नेताओं के इन बुरे मंनसुबो पर रोक आम जनता यानि मतदाता ही लगा सकते है। अब समय आ गया है कि ऐसे नेताओं से डरे नहीं बल्कि मुंहतोड़ जवाब दें
Tuesday, November 3, 2009
मत दोहराना 1984


1984 को कौन भूल सकता है। जिसने भी उस दृश्य को देखा बस एक आह भर कर रह गया। चाहते हुए भी कोईकुछ न कर सका। सरेआम सड़कों पर मौत का खेल खेला गया। क्या जवान, क्या बुजुर्ग यहां तक की बच्चों वमहिलाओं को भी माफ नहीं किया गया। गलों में जलते टायर ड़ालना, गाड़ियों व घरों को परिवार समेत जलाना वमहिलाओं की इज्जत के साथ खेलना पापी अपनी जीत समझ रहे थे। उन जख्मों को आज तक नहीं भूलाया जासका। जिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने अपने परिवार को कत्ल होते देखा, उन्हें आज भी नींद नहीं आती।
क्या कोई चाहेगा कि वो दोबारा हो, कोई नहीं। कहते हैं कि इतिहास पुनः वृति अवश्य करता है। आज फिर मौसमबदल रहा है। हमारे देश के सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है। सरकार के प्रति नफरत की आग फिरसुलग रही है। माने या न माने यह बिल्कुल वैसी ही आग है जैसी आग ने कभी पंजाब को अपने आगोश में लियाथा। बस इसने अपनी जगह बदली है वह पंजाब की उपजाऊ भूमि से झारखंड व आंध्रप्रदेश के जंगलों में पहुंच चुकाहै। अब तक तो आप समझ ही गए होंगें, जी हां यह नक्सलवाद ही है। जिसे आप आजकल समाचार पत्रों में पढ़ वटीवी,रेड़ियो पर आम सुन व देख रहे हैं। इन दिनों अगर देश के मीडिया में नक्सलवाद छाया हुआ है तो इसकी वजहहै, हर रोज कहीं न कहीं सैंकड़ों पुलिस वालों या आम आदमियों के मारे जाने की खबर। जो हमारा दिल दहलातीरहती है। हर किसी के मन से बस यही सवाल उठता है, क्या है नक्सलवाद ? क्या है उनका उद्देश्य ? क्यों बनाते हैंये आम आदमी को निशाना ? ये वो लोग हैं जो किसी न किसी तरह से सरकारी नीतियों से पीड़ित है। इनमेंअधिकतर आदिवासी हैं जिनका जीवन स्तर आज 21 वीं सदी में भी बिल्कुल शून्य है। वहां की स्थिति इतनीदयनीय है कि वहां के निवासियों को अभी तक हल चलाना भी नहीं आता। एक सर्वेक्षण में यह बात निकलकरसामने आई थी कि अगर केन्द्र से 1 रूपया ग्रामीण विकास के लिए भेजा जाता है, तो गांवों तक केवल 10 पैसा हीपहुंचता है परन्तु इन आदिवासी क्षेत्रों में 10 पैसा भी नहीं पहुंचता। ऐसे में अगर वे ऐसा कहते हैं - दिल्ली कि सत्तामें कोई भी सरकार आए इससे उनका कोई मतलब नहीं है, तो गलत भी क्या है। वे तो केवल अपने हक की लड़ाईलड़ रहे है। दूसरी तरफ सरकार कहती है कि वे दिल्ली की सत्ता चाहते हैं। उनका उद्देश्य देश में अशांति फैलाना है।वो इसको रोकने के लिए सैनिक कार्यवाही करेगी। गृह मंत्रालय के इस फैसले के बाद नक्सली गतिविधियों में ओरइजाफा हुआ है। यहां यह बात समझने वाली है कि अगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहेंगे तो मसलासुलझने कि जगह और भी उलझता ही जाएगा। अगर सरकार यह समझती है कि वह हथियारों के दम पर इन्हें दबालेगी तो यह उसकी सबसे बड़ी मूर्खता है। इससे आम जन जीवन का जो नुकसान होगा उससे देश का माहौल बिगड़सकता है यह बिल्कुल वैसी ही स्थिति होगी जैसी इस समय अफगानिस्तान व कुछ समय पहले ईराक की थी।ऐसा कोई भी नहीं चाहता। तो ऐसे में इस समस्या का हल क्या हो। ऐसा क्या किया जाए कि सांप भी मर जाए औरलाठी भी न टूटे।
यह केवल आमने सामने बैठकर बातचीत से ही संभव हो सकता है, जैसा कि नागालैंड में किया गया। इस बात कोदोनों पक्ष समझते हैं परन्तु समस्या यह है कि नक्सली सोचते हैं कि कहीं उनके साथ धोखा न हो जाए और सरकारकहती है कि सारी शतेर्ं उनकी मानी जाएं। ऐसे में दोनों पक्षों को समझना होगा कि थोड़ा-थोड़ा नुकसान तो दोनोंको उठाना ही पड़ेगा। इससे ही उन दोनों व पूरे देश को फायदा है। मीडिया इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैक्योंकि दोनों पक्ष इस पर विश्वास करते है। अतः मीडिया को बेझिझक सामने आना चाहिए ।
Friday, September 25, 2009
Wednesday, March 18, 2009
मंदी से बेखोफ चुनाव
मनमोहन सरकार का कार्यकाल खत्म होते ही , 15वी लोकसभा के गठन के लिए चुनावी बिगुल बज चुका है सभी प्रकार की सोचने पूरी की जा चुकी हैं। 16 अप्रैल से 7मई की तारीख निर्धारित कर दी गई है भारत के इन आम चुनावों को सबसे बड़े चुनाव कहना ग़लत नही है यह चुनाव दुनिया के अब तक के सबसे खर्चीले अमेरिकी चुनावों का रिकार्ड त्तोड़ने जा रहे हैं पिछले दिनों ओबामा को राष्ट्रपति बनाने के लिए बात चुनावों में आठ हजार है रुपए खर्च किए गए थे भारत में इस बार दस हजार सोचने रुपए खर्च किए जायेंगे
सेंट्रेल फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के अनुसार यह चुनाव पिछले आम चुनावों से दोगुने की होंगे पिछले चुनावों में खान चार हजार करोड रुपए खर्च किए गए थे खर्चे के अतरिक्त अन्य आंकडो के हिसाब से भी यह चुनाव सबसे आगे हैं इन चुनावों में लगभग इकहत्तर लाख इकतालीस हजार मतदाता , ग्यारह लाख वोटिंग मशीनों का प्रयोग 8,28,804 करोड मतदान केन्द्रों के लिए किया जाएगा
यहाँ दूसरी तरफ़ पूरा विश्व मंदी से परेशान है वही भारत के आम चुनाव इससे बिल्कुल खान है। इसका अर्थ है की हम आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त है यहाँ यह भी सोचने वाली बात है , कि इतना पैसा आखिर आएगा कहाँ से कहीं यह आम आदमी का पैसा तो नही। क्योंकि एक तरफ़ हम मंदी का रोना रो रहे है। हजारों कि सख्या में लोगो को बेरोजगार किया जा रहा है, कंपनीयों द्वारा भारी घाटे का सबूत देकर। इससे तो सीधे तोर पर यह समझा जा सकता है कि चुनाव के नाम पर खर्च होने वाली राशिः का सीधा असर आम आदमी कि जेब पर पड़ेगा। में सरकार से सवाल पूछना चाहता हूँ । क्या इस पैसे को जरुरत मंद लोगो पर नही खर्चा जा सकता। क्या सरकार को उनसे कोई मतलब नही , जिनके वोटों के बल पर सरकार का निर्माण होता है। क्या किसी के मुहं से रोटी का टुकडा छीनना मानवता है।
Friday, January 23, 2009
खामोश पन्ने

पास किसी के लिए समय नही वह इस भागदौड वाली जिंदगी में खो चुका है, परन्तु यह मेरा सोभाग्य है, की सुबह -सुबह चाय की चुस्कियों के साथ कोई भी मुझे पड़ना नही भूलता, चाहे व् बस टाइम पास के लिए हो ,लकिन व् कुछ ग्रहण किए बिना नही रह सकतामैं ज्ञान से भरपूर हूँ , परन्तु फ़िर भी कुछ लोग ऐसे है ,जो मुझे व्यर्थ मानते है जो बार-२ मेरा होंसला व् विश्वाश तोड़ने की कोशिश करते है क्योंकि वे इस आधुनिकता के युग में टीवी व् इन्टरनेट जैसे नए साधनों के शिकार हो चुके इन खामोश पन्नों की अहमियत भूल चुके है, वे भूल चुके है कि सभी संचार माध्यमों का आधार में ही हूँ प्राचीन समय में सूचनाओं और संदेशो को लिखित रूप में ही आपस में बांटा जाता था क्या हो गया अगर मानव ने संचार के नए साधनों का विकास कर लिया है शायद मेरी कमजोरी यह रही कि में अपने आप में चाहते हुए भी वह परिवर्तन न कर सकी जो समय के साथ करने जरुरी थे
कभी -कभी मेरे मन में विचार आता है ,कि मैं बोल क्यो नही सकती अगर बोल सकती होती तो चिला-२ कर लोगों को अपना दर्द बता देती फ़िर सोचती हूँ ,शायद यह खामोशी ही मेरी ताकत है क्या हुआ अगर मेरे पास आधुनिक युग के हथियार चलचित्र व् आवाज़ नही ,मेरे पास रंगों व् शब्दों कि वह खूबियाँ है, जो मेरे रूप को निखारती है
कभी-कभी मैं अपना अंत नजदीक देखती हूँ, फ़िर कुछ ऐसे लोग मेरे लडखडाते हुय कदमों को संभालते है कि मैं फ़िर चलने लगती हूँ इन अच्छे व् ज्ञानी लोगों के बारे मैं सोचते हुए खुश हो जाती हूँ ,चलो कोई तो है जो मेरी महत्वता को समझता है
इसी उधेड बुन मैं फंसे-२ सोचती हूँ ,अब मैं अपने क़दमों को लड़खडाने नही दूंगी , मैं समय का मुकाबला करूगीं ,उन लोगो कि ताकत बनुगी जिनकी कलम के ब्ल्भुते मैं चलती हूँ वह मुझे अपना सब कुछ मानते हैं ऐसे लोगों का मैं सत् -सत् प्रणाम करती हूँ
सुमीत विर्क
